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Friday, 15 April 2016

महाराजा कामेश्वर सिंह जो दरभंगा के अंतिम महाराज थे ,जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें कोई संतान नहीं था पूरी तरह सही नहीं है . श्रीमति कामनी देवी उर्फ़ शकुन्तला देवी , जो मझली महारानी की कजन थी से गन्धर्व विवाह १९३९ में हुआ जब मझली महारानी बिमार चल रही थी और शकुन्तला देवी महारानी (कामेश्वरी प्रिया साहिबा ) के कहने पर दरभंगा महल में अप्रैल -जुलाई १९३९ में ठहरी थी और इसी दौरान महाराजा से लगाव हो गया था और फरबरी १९४० में पटना के अस्पताल में कामनी देवी ने एक बच्चे को जन्म दिया .कामनी देवी ने प्रिवी कौंसिल में महाराजा के खिलाफ  एक वाद दाखिल किया था ( SM KAMANI DEVI ALIAS SAKUNTALA DEVI VS. SIR KAMESHWAR SINGH OF DARBHANGA) लेकिन गन्धर्व विवाह की मान्यता मिथिला के शादी में मान्य नहीं होने के कारण इस शादी को  अवैध करार दिया गया . भारत के प्रख्यात वकील पी . आर. दास इस वाद में महाराजा के वकील थे और इस केस का बहस आनंद बाग महल में हुआ था.शकुंतला देवी लालबाग दरभंगा के रहनेवाली थी.
    महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली शादी  दरभंगा जिला के उजान ग्राम के राजलक्ष्मी जी से दूसरी शादी १९३५ में मधुबनी जिला के मंगरौनी की कामेश्वरी प्रिया साहिबा से जिसे महाराज बहुत चाहते थे और  २८ ओक्टुबर १९४० में उनकी मृत्यु होने के बाद काफी विचलित हो गये थे उन्ही के नाम पर मिर्जापुर दरभंगा में कामेश्वरी प्रिया पुअर होम की स्थापना फ़रवरी १९४१ में महाराजा ने किये ,  बाद में उसी गांव के कल्याणी (कामसुन्दरी जी )से महाराजा की तीसरी शादी १९४५ में  हुई। महाराजा की पहली पत्नी राजलक्ष्मी जी धर्मभीरु महिला थी और रामबाग महल जो किला के अंदर है, में  रहती थी और उनका अधिकांश समय पूजा ,भजन ,धर्म -कर्म में बित्ता  था. वह कृष्ण्णाष्टमी धूमधाम से मनाती थी. उनके जीवित रहने तक दरभंगा का इंद्र पूजा काफी धूमधाम से होता रहा वे इंद्र पूजा में स्वंय इंद्र भवन में उपस्थित रहती थी। महाराज के चिता पर उन्होंने माधेस्वर प्रांगण जो राज परिवार का शमशान है में मंदिर का निर्माण करायी  जो मधेश्वर का अन्तिम मंदिर है। उनकी मृत्यु १९७६ में हुआ। महाराजा के उक्त तीनो महारानी से कोई संतान नहीं था इसीलिए महाराजा ने अपनी वसीयत में अपनी कुल संपत्ति का एक तिहाई सम्पति दरभंगा के लोगों के कल्याणार्थ लिख दी।