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Wednesday, 30 August 2017

बागमती के किनारे आम और लीची बागान सहित ६१ बीघा जमीन महाराजा कामेश्वर सिंह ने मिथिला रिसर्च इंस्टिट्यूट के स्थापना के लिए दान दिए . उक्त इंस्टिट्यूट की स्थापना देश के प्रथम राष्ट्रपति डा . राजेंद्र प्रसाद के करकमलों द्वारा १९५१ में दरभंगा के कबराघाट के महेशनगर परिसर में हुआ . महेशनगर के नाम को लेकर एक मजेदार  वाकया है .उन दिनों बिहार सरकार में एक मंत्री महेश सिंह हुआ करते थे . लोगों को महेशनगर उनके नाम पर होने की ग़लतफ़हमी हो गयी जिसको लेकर तत्कालीन सी ऍम श्री कृष्ण सिंह खुश नहीं थे . सी ऍम के ग्रुप ने महेश सिंह के नाम पर इस इंस्टिट्यूट का नाम रखने पर विधान सभा में क्वेश्चन किया जब बतलाया गया कि महेश नगर महाराज के पूर्वज म म महेश ठाकुर के नाम पर है तो विधान सभा में हंसी फुट पड़ी थी .
कोर्ट ऑफ़ वार्डस के दौरान महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह मात्र दो साल के थे उन्हें  बहुत ही योग्य  सहृदय इंग्लिश शिझक मिस्टर चेस्टर मैनहटन ( Macnaghten ) से शिझा मिली . चेस्टर  को उसके बाद राजकुमार कॉलेज , राजकोट का पहला प्रिंसिपल बनाया गया . यह राजकोट के केंद्र में स्थित है। राजकुमार कॉलेज, इस शहर का सबसे पुराना कॉलेज और शिक्षा केंद्र है। इसकी स्‍थापना, कठियावाड शाही परिवार के युवाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से की गई थी ताकि वह सफल शासक और अच्‍छे इंसान बन सकें। यह कॉलेज 1868 में अस्तित्‍व में आया और आधिकारिक तौर पर इसका उद्घाटन 1870 में किया गया.यह २६ एकड़ में है . इसमें पोरबंदर , कच्छ , भावनगर , नवानगर के महाराजकुमार ने शिझा ग्रहण की . महाराजा रंजीत सिंहजी (क्रिकेट ) भी विद्यार्थी रहे . वर्तमान में इसकी फ़ीस ४- ६ लाख प्रति वर्ष है .

महाराज लक्ष्मिश्वर सिंह की स्टेचू

उग आये पत्तों की झुरमुट और बी  डी डी  बाग़ पर लगातार ट्रैफिक इसे दृश्य से ओझल करता है फिर भी यदि मौका मिले तो जरा ठहर कर कोलकाता के डलहौज़ी स्क्वायर के दझिण - पश्चिम कोना में दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह की स्टेचू को जरूर देखें . प्रशंसा किया बिना नहीं रहेंगें .  यह सफ़ेद संगमरमर की मूर्ति अन्य मूर्ति से अलग है . अन्य मूर्ति जहाँ खड़ी मुद्रा में है वहीँ यह पलथी मार कर अलंकृत सिंहासन पर दाएं हाथ में तलवार , बांये में ढाल , शिर पर पारिवारिक रत्न से सजी पाग तथा गले में भारत साम्राज्य का शूरवीर नाईट कमांडर का चेन पहने हुए है . एक एक विवरण बखूबी तरासी हुई जो इस मूर्ति को कला के झेत्र में अनुपम बनाती है . दूसरी खूबी यह प्रख्यात ब्रिटिश मूर्तिकार एंड्रू ओस्लो फोर्ड का इंडिया में निर्मित दो मूर्ति में से एक  ज्ञ है .  एक घोड़े पर सवार मैसूर के महाराज वादियर चमराजेंद्र X की है जो पहले कर्ज़न पार्क के सामने थी जो  अब बंगलोर के लालबाग बोटैनिकल गार्डन में है l लंदन में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ग्लेडस्टोन की खड़ी मूर्ति उनके द्वारा निर्मित काफी चर्चित रहा है .  कोलकाता के ४२ चौरंगी के दरभंगा के महल के रियल स्टेट के कंपनी द्वारा खरीदने और तोड़ दिए जाने के बाद यही स्टेचू सिटी ऑफ़ जॉय से सिटी ऑफ़ पोंड , दरभंगा का रिस्ता बताने को शेष हैं .इस मूर्ति का अनावरण २५ मार्च १९०४ को बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंड्रू फ़्रेज़र द्वारा सर गुरुदास बनर्जी (जो कोलकाता यूनिवर्सिटी जे पहले भारतीय कुलपति थे तथा बंगाल हाई कोर्ट के जज थे ) , राजा पियरे मोहन मुखर्जी जो लक्ष्मीश्वर सिंह के साथ हीं शाही परिषद् के सदस्य थे की गरिमामयी उपस्थिति में हुई . महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के वारे में कलकत्ता ओल्ड एंड न्यू के लेखक H. E. A. COTTON  की चर्चित किताब जिसने सभी किताबों का रिकॉर्ड तोड़ दिया ने कहा है कि ये पूर्व और पश्चिम की विशेषताओं को सफलतापूर्वक जोड़ने का काम किये . हमें अपने ऐसे बिभूतियों पर गौरव करनी चाहिए जिनकी चर्चा पूर्व से लेकर पश्चिम तक है उनके सम्मान से दरभंगा का मान बढ़ेगा इसे हमें याद रखना होगा .

Saturday, 22 July 2017

सी . राजगोपालाचारी और दरभंगा राज

    महाराजा कामेश्वर सिंह की सम्पतियों ,कीर्ति  के बारे में आप सभी परिचित होंगे।  मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से उनके विचारों जो उन्होंने १९३४ के भूकम्प के महात्रासदी के समय इंडिया पोस्ट को दिये  इंटरव्यू ,हिन्दू यूनिवर्सिटी और कौंसिल ऑफ़ स्टेट के सम्बोधन  को आप के बीच रखा।हम उन्हें दरभंगा के महाराजा के रूप में जानते हैं लेकिन वास्तव में एक सच्चे राष्ट्र भक्त और देश के अग्रणी राजनेता थे , कांग्रेस को मजबूत करने,गोलमेज कॉन्फ्रेंस में भाग लेने ,संविधान सभा के सदस्य और कौंसिल ऑफ़ स्टेट ,राज्य सभा के सदस्य के रूप में गहरा योग्यदान था ,गांधीजी ,राजेंद्र प्रसाद जैसे देश के प्रमुख नेता से उनके तालुकात थे। आजादी के बाद    उनके कांग्रेस से मतभेद  थे जो पारम्परिक मूल्य को बरक़रार रखने को लेकर और स्वतंत्र कल -कारखाने  और निजी स्वामित्व को लेकर था।   कांग्रेस से अलग होकर सी राजगोपालाचारी( जो मौन्टबेटेन के बाद पहले भारतीय गवर्नर जनरल बने ,पटेल के बाद गृह मंत्री ,मद्रास के पहले मुख्यमंत्री) ने कांग्रेस के नागपुर सेशन के  तुरंत  बाद मद्रास में सन १९५९  में महाराजा कामेश्वर सिंह की परिकल्पना पर कांग्रेस के नीति के विरोध में स्वतंत्र पार्टी के निर्माण की घोषणा की। तो आये जाने ---                                                                                                                                                                       C. Rajagopalachari: Biography from Answers.com

Friday, 7 July 2017

जब बिहार ने झेला बंटवारे का दंश

 १९१२ में बंगाल से पृथक बिहार और उड़ीसा राज्य बना जिसकी राजधानी पटना बना l इस राज्य को बनाने में दरभंगा के रमेश्वर सिंह का काफी योग्यदान रहा था l फिर १९३६ में बिहार से उड़ीसा अलग राज्य बना और पोर्ट विहीन हो गया यानि समुद्र से किनारा हो गया और अब झारखण्ड के पृथक होने से खनिज संपदा से विहीन l जब बिहार से झारखण्ड अलग हो रहा था  उस समय मैं  बिहार विधान परिषद् का कर्मी था और झारखण्ड विधान सभा में योग्यदान देने के लिए रांची  गया था I बिहार से जुदा होने के वक्त काफी दुखी था, सुनहले भविष्य  की  कल्पना थी,१८ नवम्बर २००० को एक भव्य समारोह में विधान परिषद् के १११ कर्मचारी /पदाधिकारी  को दिनाक १९ नवम्बर २००० के अपराह्न से विरमित करते हुय निदेश दिया गया कि पदग्रहण काल का उपयोग किय बिना ही दिनांक २१.११. २००० तक झारखण्ड विधान सभा सचिवालय में योग्यदान कर लें लेकिन हमलोगों को झारखण्ड में योग्यदान नहीं हो सका हमलोगों ने विशेषकर बिहार के निवासी ने राहत कि साँस ली और वापस बिहार विधान परिषद् में योग्यदान दिया उस समय हमलोगों ने बिहार से जुदा होने का दर्द महसूस किया जो आज भी जेहन में है I बिहार के लिए आत्मीयता और अधिक  बढ़ गयी और २००२ के दिसम्बर में एक आलेख लिखा जो  HT PATNA Live के 6 जनवरी 2003 के अंक में प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था  'नॉट ए बास्केट केस'-
 "BIHAR,THE land of Lord Budha and Bhagwan Mahavir has today earned the reputation of a land of crime and corruption.The very reputation has proved a millstone around its neck.The recent outbursts of two senior Government officials( both of being Bihari) clearly reflect the inner feelings of Bihar is about the present scenario in Bihar,
  This is just a small crack .The Year 2003 will witness spontaneous reaction of the masses to the spectra  of crime and corruption looming large over Bihar and eagerness to work for a fundamental change in the entire system to regain for the state its lost glory . The Chankya brain will be applied not only to the politics but also to the matters concerning the states economy.
I hope in 2003 Bihar will emerge as a place of living community ,which has the motivation and the capability to act fundamental changes in crucial spheres .
 Opening of Gaya International Airport has given the single that tourism industry will flourish in 2003.Places of the historical value ,such as Bodh Gaya,Rajgir,Nalanda,Pawapuri,Vaishali will attract global tourists.Importance of Information Technology has been recognized by the State Government and the decision to establish an IT Park is certainly a step forward in the development of the IT sector in 2003.The fertile lands of the state can be used to fillip to the agro based industries,World famous Madhubani Painting,Handloom,Tasar Silk,Lichhi and Makhana will attract foreign direct investment (FDI).
The people of Bihar are industrious.Its labor force has established its reputation for hard work not only inside the country but even outside it, Far away places like,Fiji,Suriname,and Mauritious .In this era of tough competition ,the student of Bihar are emerging victorious in their respective field.
Lets hope positive aspects of Bihar get highlighted in the media in the new year and help retrieve its lost image of a state on the move.
A land of such great potentialities with its reservoir of hard working and industrious labour and intellectuals besides a rich historical background will certainly raise from its present stupor to lead the nation as it did in the ancient times.Sooner or later ,we will be proud to be called Bihari."
बिहार कोमा से निकल विकास के मार्ग पर अग्रसर है ,बिहारी की श्रम शक्ति ,बुद्धिमत्ता  तथा बिहार की एतिहासिक ,धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पुरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करने में सझम हैI इस भूमि ने सीता को जन्म दिया है यह पावन भूमि शिखर पर जाएगी और देश-दुनिया को एक नयी दिशा देगी I  

Wednesday, 5 July 2017

कमला

   
जय जय जगजननि भवानी त्रिभुवन जीवन - रूप। 
हिमगिरिनन्दिनि थिकहुँ दयामय कमला कालि स्वरुप।। 
विधि हरि हर महिमा नहि जानथि वेद न पाबथि पार। 
आनक कोन कथा जगदीश्वरि विनमौ बारंबार।।
पूर्वज हमर जतय जे बसला आश्रित केवल तोर। 
श्रीमहेश नृप तखन शुभंकर किंकर भए तुअ कोर।।
विद्या धन निधि विधिवश पबिअ माधवसिंह नरेश।
वागमती तट भवन बनाओल दरभंगा मिथिलेश।।
हमरहु जखन राज सँ भेटल अंश अपन तुअ पास। 
पूर्ण आश धए तृणहिक धरमे कएलहुँ जननि निवास।।
क्रमिक समुन्नति शिखर चढ़ाओल करुणामयि जगदम्ब। 
राज - दार तनया देल सुत - युग राजभवन अविलम्ब।।
वागमतीक त्याग तुअ देखिअ राजनगर तुअ वास। 
राजक केन्द्र प्रधान बनाओल तुअ पद धरि विश्वास।।
सम्प्रति जलमय जगत बनाओल लीला अपरम्पार। 
राजनगर निज रक्षित राखल ई थिक करुण अपार।।
करब प्रसन्न सेवन सँ अंहकेँ ई नहि अछि अब होश। 
वसहज प्रमोद जननि करू सुत पर एकरे एक भरोस।।
जखन शरीर सबल छल तखनहु सेवत नहि हम तोहि। 
अब अनुताप - कुसुम अंजलि तजि किछु नहि फुरइछ मोहि। 
कर युग जोड़ि विनत अवनत भए करथि रमेश्वर अम्ब। 
सत चित आनन्द - रूप - दान मे करब न देवि विलम्ब।।
                                      म ० रामेश्वर सिंह 

Saturday, 1 July 2017

भारत के महान साधक

तिरहुत सरकार महाराजा महेश्वर सिंह का देहान्त १८ ६ ० में जब हुआ उस समय उनके दोनों पुत्र बहुत छोटे थे बड़े सरकार लक्ष्मिश्वर सिंह  का उम्र २ साल  और छोटे सरकार रमेश्वर सिंह का एक साल भी पुरे नहीं हुए थे l अंग्रेजी हुकूमत ने मिथिला के इस राज  को  वार्ड  ऑफ़ कोर्ट के अधीन ले लिया और  युवराज लक्ष्मिश्वर सिंह  को अपने देखरेख में  और माता से भी मिलने पर पाबन्दी लगा दी l  अंग्रेजी शिझक  प्रमुख शिझाविद मिस्टर चार्ल्स मैकनाघटेन (Macnaghten), मिस्टर  जे . एलेग्जेंडर और कैप्टेन एवंस गॉर्डोन   का बंदोबस्त कर दिया l दरभंगा राज के वे दोनों भाई  पहले राजा हुए जिन्हें अंग्रेजी तालीम दी गयी  और राज का शासन  १८८० तक अंग्रेजों के अधीन होने लगा और  माता के विरुद्ध अंग्रेजी शिझक से पढाई दी जाने लगी l राजमाता ने इसका कड़ा विरोध किया और युवराज का स्थानीय अभिभावक युवराज के निकटतम चाचा को बना दिये जिन्होंने अपनी संस्कृति के अनुरूप  शिझा-दिझा संस्कृत के प्रमुख विद्वानों द्वारा   दोनों राजकुमारों  को देने की  अलग से  व्यवस्था की l  बाद में देश की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी बनारस के क़ुईन्स कॉलेज में पढाई की  जिसका फलाफल हुआ कि रमेश्वर सिंह संस्कृत एवं हिन्दू संस्कृति के तरफ आकर्षित हुए और  ब्राह्मण  संस्कृति के अनुरूप पूजा पाठ और   आध्यात्म  उनकी पहली अभिरुचि हुई l अंग्रेजी ,फारसी  में भी उनकी अच्छी पकड़   थी l बालिग होने पर बड़े भाई लक्ष्मिश्वर सिंह दरभंगा  महाराज की गद्दी पर  आसीन हुए  और राजा रमेश्वर सिंह  १८७८ में  भारतीय सिविल सेवा में चले गये और दरभंगा , छपरा और भागलपुर में असिस्टेंट मजिस्ट्रेट रहे  l इसी दौरान ब्रिटिश हुकूमत के अंग्रेज पधाधिकारियों से मित्रता हुई जिन्हें वे हिन्दू संस्कृति ,अध्यात्म के विषय में जानकारी दी और अंग्रेज के आधुनिक औद्योगिक ,व्यापार ,तकनिकी की जानकारी प्राप्त की l उन पदाधिकारियों में जॉर्ज ग्रिएरसन (प्रमुख भाषा शास्त्री ) , इ .ए. गेट  जो बाद में नवनिर्मित  बिहार राज्य  के उप राज्यपाल हुए  आदि जो उनके सहकर्मी थे यानि भारतीय सिविल सेवा के पदाधिकारी l  उन्हें दरभंगा से दूर बछोर परगना दिया गया l इन्होने राजनगर में अपना राज प्रसाद बनाया  जिसकी भव्यता राजा जनक की राज की याद दिलाती थी l दरभंगा के महाराज बड़े भाई लक्ष्मिश्वर सिंह की मात्र ४० वर्ष की आयु में मृत्यु के बाद १८९८ में ३८ वर्ष की आयु में दरभंगा की राजगद्दी पर आसीन हुए तबतक उन्हें कोई संतान की प्राप्ति नहि हुई थी l उन्होंने कामरूप कामख्या  में  संतान की प्राप्ति हेतु तंत्र साधना की थी जिसके बाद उन्हें तीन संतान की प्राप्ति हुई l  उनका काफी समय आध्यात्म और पूजा पाठ में व्यतीत होता था l दरभंगा राज का कामकाज काफी विस्तृत रहने के कारण सिविल सेवा से त्यागपत्र देकर अपना पूरा समय मिथिला राज ,हिन्दू संस्कृति ,आध्यात्म में देने लगे l हिन्दू संस्कृति को देशभर में फ़ैलाने के लिए  दि हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसाइटी ,आध्यात्म के फ़ैलाने हेतु अगम अनुसंधान समिति कोलकाता  जो संस्कृत के ग्रंथों का अंग्रेजी अनुवाद कर प्रकाशित करती थी ,  धर्म को देशभर में फ़ैलाने हेतु भारत धर्म महामंडल जिसका मुख्यालय बनारस था और देश के सभी जगह इसकी ब्रांच कार्यालय थी  और मैथिलि के लिए मैथिल महासभा की स्थापना कर देश में अंग्रेजी शिझा  और सभ्यता को एक तरह से चुनौती देने का काम किये और राष्ट्रवाद को एक ताकत दी l हिन्दू राजाओं यथा नेपाल ,ग्वालियर ,कश्मीर ,जयपुर  उन्हें अपने  धार्मिक और  अध्यात्मिक गुरु के रूप में देखते थे  और उनपर श्रद्धा रखते थे  l सिख शासक महाराजा पटियाला से जहाँ उनकी  मित्रता थी वहीँ बोम्बे के आगा खां उनकी आगवानी करते थे l  हिन्दू ,सिख ,जैन , मुसलमान धर्म के  माने हुए प्रमुख व्यक्ति के प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किये और कोलकाता और इल्लाहाबाद में हुए  सभी धर्मो और संप्रदाय के बीच एकता हेतु पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजनस की बैठक की सभापतित्त्व किये l   पहली आल -इंडिया ब्राह्मण कांफ्रेंस ,लाहौर की सभापतितव किये l   देश के कई हिस्से में कल कारखाने लगा कर औद्योगिक क्रांति की आगाज की l   वहीँ खेती के विकास के लिए  देश के जमीन मालिकों  का एक देशव्यापी  संगठन बनाये l मिथिला राज्य की मांग करते हुए बिहार के राज्यपाल के माध्यम से दी गयी ज्ञापन में उन्होंने स्पष्ट उल्लेख किये कि उन्हें लौकिक के साथ आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त हैl इन्होने अपनी अध्यात्मिक शक्ति से नदी की दिशा बदल दी थी जिसका  उल्लेख बंगाल उच्च न्यायलय के जज जॉन वुडरुफ्फ़ ने अपनी पुस्तक (BENGAL AND TANTR) में की है l उनके तीन प्रमुख संस्था दि हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसाइटी ,भारत धर्म महामंडल और अगम अनुसंधान समिति क्रमशः ऍम . ऍम . मालवीय ,गोपाल कृष्ण गोखले ,दीनदयाल शर्मा ,आर्थर अवलोन के  द्वारा  संचालित होता था जिसके महाराज रमेश्वर सिंह संस्थापक अध्यझ एवं मुख्य वित् पोषक थे l